
‘व्हाइट कॉलर टेररिज्म’ के बाद अब पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ एक और खौफनाक और शर्मनाक तरीका अपनाया है। इस बार निशाने पर हैं—भारत के नाबालिग बच्चे।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक़, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI बच्चों को ऑनलाइन जाल में फंसाकर उनका डिजिटल ब्रेनवॉश कर रही है और उनसे भारत के संवेदनशील ठिकानों की जानकारी जुटवाई जा रही है।
जहां एक तरफ़ दुनिया Child Rights की बात करती है, वहीं पाकिस्तान बच्चों को “Spy Asset” बना रहा है।
37 नाबालिग Security Radar पर
रिपोर्ट के मुताबिक़, 37 से अधिक नाबालिग बच्चे इस समय सुरक्षा जांच के घेरे में हैं। इनमें 12 बच्चे पंजाब और हरियाणा से 25 बच्चे जम्मू-कश्मीर से जांच में सामने आया है कि ISI 14 से 17 साल के बच्चों को खास तौर पर टारगेट कर रही है।
Samba से हुआ बड़े नेटवर्क का खुलासा
इस पूरे Child Spy Network का पर्दाफाश जम्मू-कश्मीर के सांबा ज़िले में पकड़े गए एक 15 साल के लड़के से हुआ। खुफिया इनपुट के आधार पर जब पुलिस ने उसे रोका, तो सामने आया कि वह लगातार पाकिस्तानी हैंडलर्स के संपर्क में था और निर्देश सीधे पाकिस्तान से मिल रहे थे।
यहीं से इस पूरे डिजिटल जासूसी नेटवर्क की परतें खुलनी शुरू हुईं।
Phone Clone, Real-Time Surveillance
पुलिस जब बच्चे का फोन चेक कर रही थी, तब असली झटका लगा। उसका मोबाइल क्लोन किया जा चुका था। मतलब— उसकी हर गतिविधि पर रियल-टाइम नज़र। फोटो या वीडियो बनते ही पाकिस्तान में डाउनलोड। फोन पर पूरा रिमोट कंट्रोल।

अब जासूसी बंदूक से नहीं, लिंक पर क्लिक से हो रही है।
एक क्लिक और पूरा फोन कब्ज़े में
जांच में सामने आया कि बच्चे को एक लिंक भेजा गया। क्लिक करते ही फोन क्लोन। फिर ऐप्स के ज़रिये लगातार संपर्क और ब्रेनवॉश बच्चों से कहा जाता था कि सुरक्षा बलों की मूवमेंट रिकॉर्ड करें। संवेदनशील जगहों की फोटो लें। काफिलों की जानकारी भेजें।
Brainwash इतना कि स्कूल ही छोड़ दिया
इस केस में सबसे डराने वाली बात यह रही कि बच्चा स्कूल जाना बंद कर चुका था, माता-पिता को भनक तक नहीं थी। वह रोज़ “स्कूल” के नाम पर निकलता था, लेकिन असल में पाकिस्तान के लिए काम कर रहा था।
जब दुश्मन किताब छीनकर मोबाइल थमा दे, तो ये सिर्फ़ जासूसी नहीं—Future Hijack होता है।
ISI अब बच्चों को Soft Target मान रही है। Digital Platforms बन रहे हैं नए War ज़ोन्स। National Security अब Parental Awareness से भी जुड़ चुकी है। यह मामला सिर्फ़ सुरक्षा का नहीं, सामाजिक और मानसिक युद्ध का है।
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